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कच्ची मिट्टी के खिलौने........

  • May 22, 2017
  • 3 min read

.......... रीत हमेशा उखड़ी उखड़ी सी रहती थी | उसे बात-बात पर माँ की रोक-टोक अच्छी नहीं लगती थी | वह बस उड़ना चाहती थी| अपने नन्हे नन्हे पंखों से पूरा क्षितिज नापना चाहती थी | माँ हमेशा समझाती, ऊँची उड़ान भरने के लिए सही वक़्त का इंतज़ार करो| प्रयास जारी रखो| पर रीत को माँ की शिक्षाएं अच्छी नहीं लगती थी| वह ग्यारवी कक्षा में पढ़ती थी| अपने बुने सपनों के और यथार्थ ज़िन्दगी में सामजस्य स्थापित नहीं कर पा रही थी| उसके दोस्त मीत का भी यही हाल था| दोनों बैठ कर कभी घर वालों को, कभी समाज के बंधनो को कोसा करते थे| दोनों हमेशा सोचते थे कि कहीं दूर भाग जाएँ| जहाँ वे अपनी मर्ज़ी की ज़िन्दगी जी सके| साथ समय बिता सके, जहाँ कोई बंधन न हो| पर ऐसे तो सिर्फ सपने होते हैं| माँ को हमेशा रीत की पढ़ाई की चिंता रहती थी| माँ कहती रहती थी कि रीत बेटा, २-३ साल मन लगा कर पढ़लो, आगे क्या करना है उसके लिए रास्ता, तुम स्वयं ही बना लोगी| रीत सोचती, २-३ साल क्यों? अभी क्यों नहीं! रीत को अच्छे कपडे पहनना लुभाता था| घूमना फिरना बहुत अच्छा लगता था| पर माँ समय को महत्व देती थी| माँ कहती थी समय सारणी बनाओ| समय पर सो जाओ, समय पर उठो, इत्यादि| आज सुबह से ही रीत का पढ़ाई में मन नहीं लग रहा था| तभी मीत आ गया| मीत ने रीत के कान में धीरे से कहा -" आज मैंने अपने दोस्त मयंक का स्कूटर मांग लिया है| स्कूल के पिछले गेट से बाहर निकल जाते हैं| पिछली सड़क पर यातायात पुलिस भी नहीं होती है| थोड़ी देर घूम कर वापिस पिछले गेट से ही, स्कूल आ जाएंगे| किसी को भनक तक नहीं लगेगी| " रीत को मीत की बात जांच गयी| कुछ देर बाद, दोनों स्कूल से रफू चक्कर हो गए| दोनों के पास न हेलमेट था, और न ही स्कूटर का लाइसेंस| मीत स्कूटर चलाते समय गाना गुनगुना रहा था .... आज मैं ऊपर आसमान नीचे ,....आज मैं आगे ज़माना है पीछे ..... रीत भी बहुत खश थी| वह आज़ाद महसूस कर रही थी| तभी सामने से एक कार आ जाती है, घबराहट में मीत स्कूटर पर नियन्त्रण खो देता है| आमने सामने की टक्कर में जब रीत को होश आता है तब वह अपने आप को अस्पताल के बिस्तर पर पाती है| सामने माँ बैठी है| रीत कुछ कहना चाहती है, पर माँ प्यार से उसके सिर पर हाथ रख देती है| गर्दन हिला कर उसे कुछ भी कहने से मना कर देती है| पास ही के बिस्तर पर मीत लेटा है और उसके माता-पिता उसके पास बैठे हैं| कुछ देर मुआयना करने के बाद डॉक्टर ने कहा शुक्र है भगवान् का की दोनों बच्चे सुरक्षित हैं| चोटें लगी हैं पर बचाव हो गया है| आप आज ही बच्चों को घर लेजा सकते हो| यह सुन रीत की माँ ने गहरी लम्बी सांस ली| मयंक का स्कूटर पूरी तरह टूट चुका था| स्कूटर पुलिस स्टेशन में खड़ा था| मीत के पिताजी ने पुलिस कारवाही पूरी होने के बाद, मयंक को स्कूटर ठीक करवाने को कहा| २०,०००-२२,००० रुपये का बिल देख कर रीत मन ही मन शर्मिंदा हो रही थी| उसे पता था पिताजी के देहांत के बाद माँ ने उसे किस तरह पाला है| उसके लिए कितना कुछ सहा है| घर की आर्थिक स्थिति भी अच्छी नहीं थी| माँ की देख रेख में रीत २-३ दिन में ही ठीक हो गयी|

आज रीत बदली-बदली सी लग रही थी| सुबह समय पर उठ कर स्कूल के लिए तैयार हो गयी| जब रीत स्कूल जा रही थी तब उसने पीछे मुड़ कर देखा माँ दरवाज़े पर खड़ी होकर उसे निहार रही थी| रीत पीछे मुड़ी और माँ के गले लग कर फूट-फूट कर रो पड़ी| उसने कहा माँ आपने ठीक कहा था, उड़ान भरने से पहले क्षितिज की ऊँचाई और सम्पूर्ण पंखो का होना ज़रूरी है| मैं वक़्त को धन्यवाद देती हूँ जिसने मुझे ज़िन्दगी जीने का दोबारा मौका दिया| वक़्त सबको मौका नहीं देता|

 
 
 

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