ज़िन्दगी
- May 21, 2017
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ज़िन्दगी ज़िन्दगी बन पहेली, हर पल उलझाती है| सावन में खूब झूला कर , फिर सूखी धरा दिखलाती है| महफ़िल में लाकर, तन्हाई में ले आती है| प्रभात की बेला पर, आशा का सूरज उगाती है| बन कर सुखद एहसास कभी, मन गुदगुदाती है| विषैली नागिन बन, फुंकारती और डराती है| क्षण भर में प्रियवर बन, हृदये से लिपट जाती है| मृग तृष्णा बन , वन वन भटकाती है| कर बहाना दुःख का, रोती और रुलाती है| न जान सकी तुझे, न जान पाऊँगी | तलाश करूंगी गर तेरी, खुद ही गुम हो जाउंगी||








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